सूत्रों के मुताबिक नक्शा पास कराने, अवैध निर्माण मामलों में राहत दिलाने, कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कराने, जमीन से जुड़े दस्तावेजों और अन्य प्रशासनिक कार्यों के नाम पर खुलेआम पैसों की मांग की जाती है। आरोप यह भी हैं कि विभाग के कुछ निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों ने अलग-अलग कार्यों के लिए “रेट लिस्ट” तक तय कर रखी है। कई लोग डर और प्रताड़ना के कारण खुलकर सामने नहीं आ पा रहे, लेकिन अंदरखाने भ्रष्टाचार की चर्चाएं जोरों पर हैं।
विशेष रूप से गाजियाबाद के इंदिरापुरम क्षेत्र में ऐसे मामलों ने अब तूल पकड़ना शुरू कर दिया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण, नक्शा स्वीकृति और संपत्ति से जुड़े मामलों में कथित तौर पर भारी स्तर पर उगाही की जा रही है। कई नागरिकों का कहना है कि बिना पैसे दिए सामान्य प्रशासनिक कार्य तक समय पर नहीं किए जाते, जिससे लोगों में भारी नाराजगी है।
इतना ही नहीं, कुछ लोगों ने आरोप लगाया है कि जब कथित रूप से मांगी गई रकम नहीं दी जाती, तब संबंधित कर्मचारी या बिचौलिए फोन पर अभद्र भाषा, गाली-गलौज और धमकी भरे अंदाज में बात कर लोगों को डराने और मानसिक दबाव बनाने का प्रयास करते हैं। इससे आम नागरिकों में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा हो रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि भ्रष्टाचार की शिकायतें कई बार उच्च अधिकारियों तक पहुंचाई गईं, लेकिन कार्रवाई के बजाय मामलों को दबा दिया जाता है। इससे रिश्वतखोर कर्मचारियों के हौसले इतने बढ़ गए हैं कि उन्हें अब न कानून का डर दिखाई देता है और न ही शासन-प्रशासन का भय।
हाल ही में दिल्ली नगर निगम (MCD) के एक डिप्टी कमिश्नर समेत कई अधिकारियों को CBI द्वारा रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किए जाने के बाद गाजियाबाद में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोगों का कहना है कि यदि केंद्रीय एजेंसियां निष्पक्ष जांच करें तो GDA में भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है। चर्चा यह भी है कि कुछ अधिकारी सत्ता और राजनीतिक संरक्षण के भरोसे खुलेआम उगाही में लगे हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति के बावजूद आखिर गाजियाबाद में यह खेल किसके संरक्षण में चल रहा है? क्या संबंधित अधिकारियों को सरकार और कानून का कोई भय नहीं रह गया है?
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