शुजी पहली बार १९८६ में एक महीने के लिए भारत आए,फिर अगले साल दो महीने के लिए आए,१९८८ में छै महीने के लिए आए|१९८८ में ही पहली बार उस्ताद अमजद अली खान जी कि कैसेट सुनी | १९८९ से उनहो ने बनारस में डॉ.रंजीत सिंह जी से सरोद सीखना प्रारम्भ कर दिया | मूल रूप से जापान के ओसाका प्रान्त के रहने वाले श्री शुजी यामामोटो इस से पहले पाष्चात्य गिटार बजते थे | यह पूछेजाने पर की उन्हें सालो से जापान छोड़ भारत में रहना कैसा लगता हैं, शुजी बताते हैं की " में बहुत प्रसन्न हूँ और अपने को भाग्येशाली अनुभव करता हूँ , मुझे यह अवसर प्राप्त हुआ "|
बनारस में उनका विवाह १९९३ में सिलबिअ जी से हुआ , सिलबिअ मूलतः इटली कि हैं और भारत में कथक सीखती हैं |अक्टूबर सन २००० में शुजी उस्ताद अमजद अली खान से मिले , और १ मई सन २००१ को उनके शिष्य बने | २००३ में शुजी सपरिवार दिल्ली आके रहने लगे | उन्हें भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) से छात्रवृत्ति प्राप्त हैं | जिसका श्रेय वह अपने गुरु उस्ताद अमजद अली खान जी को देते हैं |
सरोद के ऊपरी भाग पर नाखुनो को उपयोग में लाया जाता हैं, अन्य तारयुक्त वाद्ययंत्रों को केवल उंगलिओ से बजाया जाता हैं | सरोद वादक प्राया किसी अन्य वाद्य को नहीं बजा पाते हैं | यह पूछेजाने पर की उन्हों ने पाष्चात्य गिटार की अपेक्षा सरोद का ही क्यों चुनाव किया शुजी कहते हैं " इस की ध्वनि पाष्चात्य गिटार की अपेक्षा अधिक मधुर हैं जो की सीधे ह्रदय को आती हैं " | उनकी दिनचर्या इस प्रकार बताते हैं की "जागता हूँ ,कॉफ़ी पिता हूँ और अभ्यास में लग जाता हूँ "| शुजी आगे कहते हैं की " शास्त्रीय संगीत में सीखना कभी समाप्त नहीं होता हैं , यदि आपमें अहंकार आया तो आप प्रगति नहीं कर सकते "|
एक विचित्र बात यह हैं की यद्पि सरोद एक हिन्दुस्तानी वाद्य हैं, शुजी इस पर कभी कभी कर्नाटिक संगीत के राग बजाते हैं | शुजी कहते हैं की इस प्रकार का प्रयोग उन्हों ने अपने उस्ताद जी से सिखा हैं| और वह यह भी बताते हैं की मूलतः हिन्दुस्तानी और कर्नाटिक एक जैसे ही हैं | शुजी और सिलबिअ दोनों साधारण भारतीय वस्त्र पहनते हैं, भारतीये देवी-देवताओ और संत महापुरषो की पूजा करते हैं और सरल शाकाहारी उत्तर भारतीय भोजन करते हैं | वह दिल्ली में रहते हैं तथा बनारस व गंगा का बहुत स्मरण करते हैं | शुजी सरोद को समर्पित हैं और सिलबिअ कथक को |

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