आज तो बस सब कुछ लुटा देने की होड़ थी। कल की कल देखी जाएगी। चारों शहीद बिहारी सपूतों की आखिरी सलामी के वक्त उनके गांव-घर में भाई लोगों (नेताओं) ने यही सीन बनाया हुआ था। राजनीति की अदाएं खूब दिखीं। अंतिम संस्कार में मौजूदगी से जुड़ी दुनियावी सोच में पिछड़े मंत्री जी बाकायदा एजेंडा बना दिए गए, तो उनकी सफाई का भी अपना अंदाज था।
शहीद होने ही सेना में जाते हैं लोग
मौके पर दिखाई देने वाला शोक, गुस्सा, दावा, चुनौती, आरोप-प्रत्यारोप .सब कुछ दलीय खांचे में था। राजनीति का एक पूर्ण मोड़। हां, पाकिस्तान के खिलाफ के नारों में कई बार जुबानें जरूर मिलीं। मनेर में अरुण कुमार सिन्हा (भाजपा विधायक) ने जब पाकिस्तान..बोला, मैं दिल्ली से आया हूं। मुझको मेरी पार्टी ने आपके पास भेजा है। मेरी पार्टी पूरी तरह आपके साथ है। हम आपके बेटे की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाने देंगे।’
एक विधायक जी, जो पहले यहां अपने हिसाब से यह सब कुछ कर चुके होते हैं, एक राष्ट्रीय पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता की इस कवायद को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। उनको लगता है कि शायद विजय के परिजन उनको भूल न जाएं और इस दिल्ली वाले को याद न रख लें, सो वे नए सिरे से फिर अपने बारे में यही सब कुछ बताने लगते हैं। वे विजय के परिजनों को यह भी याद कराते हैं कि ‘मैंने तो अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष से आपको बात कराया है।’ असल में यहां इलेक्ट्रानिक चैनल के रिपोर्टर हैं।
यह कुछ करते हुए दिखने की होड़ है। यहां उद्योग मंत्री रेणु कुशवाहा मौजूद हैं। उनके पास शहीद के परिजन को देने के लिए दस लाख रुपये का चेक है। लेकिन सम्हौता (छपरा) और नौतन (छपरा) में दूसरा सीन है। यहां कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह व गन्ना विकास मंत्री अवधेश प्रसाद कुशवाहा बड़े परेशान हैं। सफाई देनी पड़ रही है।
सम्हौता शहीद प्रेमनाथ सिंह तथा नौतन, शहीद रघुनंदन प्रसाद का गांव है। मंत्री जी तब पहुंचे हैं, जब दोनों का अंतिम संस्कार हो चुका होता है। वे दस-दस लाख रुपये का चेक व सांत्वना लेकर आए हैं। लोग उनसे, गांव पहुंचने में हुई देरी के बारे में सवाल पूछ रहे हैं। विरोध है। नारे हैं। खैर, सब कुछ शांत होता है। खाद्य आपूर्ति मंत्री श्याम रजक दो- दो बार जगदीशपुर (भोजपुर) जाते हैं। शहीद शंभू राय के घर। लेकिन तब वहां नहीं रह सके, जब अंतिम संस्कार हो रहा था। दूसरी बार में वे शहीद के परिजनों को दस-दस लाख रुपये का चेक देने गए थे। यहां भी कमोबेश वही सबकुछ, वही अंदाज, वही रंग..जो और जगहों पर था। राजकीय सम्मान को तकनीकी नजरिये से देखें, तो सरकार ने विपक्ष के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। सभी चारों स्थानों पर शहीदों के अंतिम संस्कार के वक्त वहां के जिलाधिकारी व आरक्षी अधीक्षक मौजूद थे। अब कल क्या होगा? यह सबसे बड़ा सवाल है? किसके पास है ईमानदार जवाब?


Post a Comment